एक-दो नहीं…देश के 9 राज्य दे रहे हैं मुसलमानों को आरक्षण, कहां और कितना आरक्षण? हैरान कर देंगे आंकड़े

नई दिल्ली। हाल ही में कोलकाता हाईकोर्ट ने राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी (ओबीसी) के तहत 2010 के बाद लोगों को जारी किए गए सभी प्रमाण पत्र रद्द कर दिए। लोकसभा चुनाव के बीच आए इस फैसले ने राज्य ही नहीं बल्कि देश की राजनीति में भी हलचल मचा दी। ऐसा इसलिए क्योंकि ओबीसी के तहत ममता बनर्जी, कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने इस श्रेणी में मुसलमानों को आरक्षण दिया था। भारतीय जनता पार्टी और अन्य विपक्षी दल इसे अपने-अपने तरीके से चुनावी मुद्दा बनाने में जुटे हैं। इस बीच बड़ा सवाल यह है कि देश के कितने राज्यों में मुस्लिम समुदाय को आरक्षण दिया गया है? किस राज्य में कितने प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण की व्यवस्था की गई है? आइए आपको इसके बारे में बताते हैं।

दरअसल, देश के एक, दो या तीन नहीं बल्कि 9 राज्यों में मुस्लिम आरक्षण का प्रावधान है। अभी केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक (कोर्ट स्टे), बंगाल (अब रद्द), तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान में यह प्रावधान है। केरल में मुस्लिम समुदाय के लिए शिक्षा में 8% और नौकरियों में 10% सीटें आरक्षित हैं। जबकि तमिलनाडु में मुसलमानों को 3.5% आरक्षण दिया जाता है। कर्नाटक में मुसलमानों को 4% आरक्षण दिया जाता था, जिसे भाजपा सरकार ने खत्म कर दिया। अब कांग्रेस ने राज्य में सत्ता में आते ही फिर से मुस्लिम आरक्षण लागू करने की कोशिश की, जिस पर कोर्ट ने रोक लगा दी।

तेलंगाना-आंध्र में कितना आरक्षण?
तेलंगाना में मुसलमानों को ओबीसी वर्ग में 4 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त है। आंध्र प्रदेश में ओबीसी आरक्षण में मुसलमानों का कोटा 7% से 10% है। उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां 28 मुस्लिम जातियों को ओबीसी आरक्षण मिल रहा है। इसके अलावा बिहार, राजस्थान समेत कई राज्यों में जाति के आधार पर मुसलमानों को ओबीसी आरक्षण में शामिल किया गया है।

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धर्म आधारित आरक्षण पहली बार कब आया?
धर्म आधारित आरक्षण सबसे पहले 1936 में केरल में लागू किया गया था, जो उस समय त्रावणकोर-कोच्चि राज्य था। 1952 में इसे सांप्रदायिक आरक्षण से बदल दिया गया जिसमें 45% आरक्षण OBC को दिया गया, जिसमें मुस्लिम भी शामिल थे। 1956 में केरल के पुनर्गठन के बाद वामपंथी सरकार ने आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाकर 50 कर दिया, जिसमें OBC के लिए 40% आरक्षण शामिल था। सरकार ने OBC के अंदर एक SUB-QUOTA बनाया, जिसमें मुस्लिमों की हिस्सेदारी 10% थी, जबकि भारत के संविधान में धर्म के आधार पर आरक्षण का प्रावधान नहीं है। संविधान निर्माता बाबा साहब अंबेडकर खुद कहते थे कि धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता।

यदि कोई दलित इस्लाम स्वीकार कर ले तो क्या होगा?
इसके अलावा अगर कोई दलित व्यक्ति हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाता है तो क्या उसे आरक्षण का लाभ मिलेगा? यह मामला भी सुप्रीम कोर्ट में है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट को संविधान के उस आदेश पर भी फैसला लेना है जिसमें कहा गया है कि हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के दलितों के अलावा किसी अन्य धर्म के लोगों को अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं दिया जा सकता। आदेश में यह भी कहा गया कि ईसाई धर्म और इस्लाम को इस आदेश से बाहर रखा गया है क्योंकि इन दोनों धर्मों में छुआछूत और जाति व्यवस्था नहीं है।

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