ग्राउंड रिपोर्ट आरा: आरके सिंह…हमेशा एक खास वर्ग के लोगों से घिरे रहते थे, जातिगत समीकरणों के चलते हार गए सीट

लोकसभा चुनाव के बाद आरा में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। यहां से दो बार सांसद रहे और केंद्र सरकार में ऊर्जा मंत्री रहे आरके सिंह इस बार ‘महागठबंधन’ के उम्मीदवार सुदामा प्रसाद से चुनाव हार गए हैं। कड़े मुकाबले में सुदामा प्रसाद ने उन्हें 59,808 वोटों से हराया। सुदामा पांडेय को 5,29,382 और आरके सिंह को 4,69,574 वोट मिले। निर्दलीय उम्मीदवार वीरेंद्र कुमार सिंह 23,635 वोट पाकर तीसरे नंबर पर रहे।

आरा लोकसभा में भाजपा के कद्दावर नेता आरके सिंह की हार के पीछे जब हमने कारण जानने की कोशिश की तो कई ऐसी बातें सामने आईं, जिसके कारण आरा समेत पूरे शाहाबाद में एनडीए को नुकसान उठाना पड़ा और एनडीए यहां की चारों सीटें हार गई।

आरा लोकसभा क्षेत्र में अधिकांश मतदाता राजपूत समुदाय से हैं। अगर ये सभी एक जगह इकट्ठा हो जाएं तो किसी भी उम्मीदवार की जीत पक्की हो जाती है। यादव समुदाय के वोट भी राजपूत समुदाय के लगभग बराबर हैं। इसके अलावा अगर भूमिहार ब्राह्मण वोटों की बात करें तो यह आंकड़ा 2 लाख से ऊपर चला जाता है। इसके साथ ही कोइरी कुर्मी समुदाय के वोट भी करीब 1,50,000 के आसपास हैं। दलित और महादलित मतदाताओं की संख्या भी यहां अच्छी खासी है। वहीं भोजपुर जिले में अल्पसंख्यक मतदाता भी काफी संख्या में हैं।

इस बार का चुनाव 2019 के चुनाव के मुकाबले काफी दिलचस्प रहा और भाजपा को उम्मीद के मुताबिक वोट नहीं मिले और उन सभी मतदाताओं ने काफी हद तक महागठबंधन के उम्मीदवार को वोट दिया, जिसके कारण आरके सिंह चुनाव हार गए।

आरा लोकसभा में भाजपा की हार का सबसे बड़ा कारण यह रहा कि सवर्ण समाज की जातियों जिसमें ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कुशवाहा मतदाता शामिल हैं, ने भाजपा के खिलाफ वोट किया। चुनाव में भाजपा लगातार सवर्ण मतदाताओं को अपना वोटर मानकर उन्हें दरकिनार करती रही है। और उनकी नजर दलितों और पिछड़ों के वोटों पर थी। लेकिन उन्हें वह वोट भी नहीं मिले। और जिन लोगों पर भारतीय जनता पार्टी और एनडीए गठबंधन ने उम्मीदें लगाई थीं, वह उनके लिए गलत साबित हुई। भाजपा के लोग सवर्ण मतदाताओं को अपने पक्ष में लाने में सफल नहीं हो पाए।

भोजपुर जिले के संदेश प्रखंड के तीर्थ कोल निवासी चर्चित किसान नेता प्रोफेसर देवेंद्र कुमार सिंह की मानें तो इस बार भाजपा की हार का सबसे बड़ा कारण सवर्ण मतदाताओं और किसानों की लगातार उपेक्षा है। नहर में सिंचाई की समुचित व्यवस्था नहीं करना, अन्य बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान नहीं देना भाजपा की हार के प्रमुख कारण रहे।

सामाजिक कार्यकर्ता अभय विश्वास भट्ट का मानना ​​है कि आरा लोकसभा के मौजूदा सांसद को ‘विकास पुरुष’ की उपाधि दी गई थी, लेकिन गठबंधन सहयोगियों से सलाह-मशविरा न करना, प्रचार-प्रसार में एकता का अभाव और एक खास वर्ग के चंद लोगों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहना पार्टी के लिए महंगा साबित हुआ। एक खास वर्ग पर ही भरोसा करना और उसी पर निर्भर रहना भी हार का कारण बना। ग्रामीण इलाकों में प्रचार-प्रसार का अभाव और सांसद के व्यवहार से खफा लोगों का गुस्सा भी बड़ी वजह रहा।

आरा लोकसभा सीट के बारे में बात करते हुए सुनील पाठक ने कहा कि आरा में बीजेपी की हार का एक बड़ा कारण पवन सिंह का काराकाट लोकसभा सीट से चुनाव लड़ना भी रहा। क्योंकि, लगातार प्रचार में यह भ्रांति फैलाई गई कि पवन सिंह का लोकसभा में कोई प्रभाव नहीं रहेगा और सोशल मीडिया से लेकर जमीन तक लगातार राजनीतिक बयानबाजी आरा लोकसभा प्रत्याशी के लिए महंगी साबित हुई और उन्हें यह सीट गंवानी पड़ी। साथ ही, बक्सर में जाति के नाम पर एक वर्ग का आरजेडी को समर्थन देना भी ब्राह्मण समुदाय को पसंद नहीं आया।

भोजपुर जिले के मशहूर चित्रकार कमलेश कुंदन के मुताबिक, भाजपा सवर्ण मतदाताओं की अनदेखी करती रही है और उसका ध्यान दूसरे समुदाय के मतदाताओं पर रहा है। इसके अलावा भाजपा प्रत्याशी अपने काम को लेकर अति आत्मविश्वास में थे और उन्हें लगा कि लोग विकास के नाम पर उन्हें वोट देंगे। लेकिन ऐन वक्त पर एक बार फिर बिहार में चली आ रही जाति आधारित राजनीति ने असर दिखाया और आरा सीट भाजपा के हाथ से फिसल गई।

एक स्कूल के संचालक संजय राय कहते हैं कि आरा लोकसभा सीट ही नहीं बल्कि शाहाबाद की चारों सीटों पर महागठबंधन प्रत्याशी की जीत एनडीए के लिए बड़ा सबक है, क्योंकि आरा चुनाव में एनडीए नेताओं में एकजुटता की कमी दिखी थी। इसके अलावा जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को चुनाव प्रचार से दूर रखना भी भाजपा के लिए महंगा साबित हुआ। शाहाबाद की चारों सीटों के अलावा पड़ोसी पाटलिपुत्र और औरंगाबाद सीटों पर भी जातीय समीकरण ने असर डाला।

सामाजिक सरोकारों से जुड़े नीलेश उपाध्याय ने कहा कि पूर्व विधायक सुनील पांडेय और पूर्व एमएलसी हुलास पांडेय ने इस चुनाव में खूब मेहनत की। इसका सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिला। लेकिन भाजपा में गुटबाजी के कारण कार्यकर्ता नेता से दूर रहे।

आरा शहर के निवासी मोहम्मद शकील के अनुसार आरा लोकसभा में विकास कार्य तो हुए, लेकिन बेरोजगारी, महंगाई और किसानों की समस्याओं को लगातार नजरअंदाज करना भाजपा प्रत्याशी के लिए महंगा साबित हुआ। साथ ही एनडीए नेताओं के बीच अंदरूनी कलह भी भाजपा की हार का बड़ा कारण बनी।

होटल व्यवसायी कुमार अभिषेक उर्फ ​​बबलू सिंह ने कहा कि आरा में मिली हार ने साबित कर दिया है कि बिहार में अभी भी जाति आधारित राजनीति लोगों पर हावी है। विकास और पार्टी का लोगों के लिए कोई मतलब नहीं है। चुनाव में वोट सिर्फ जाति के आधार पर ही दिए जाते हैं। इसके अलावा आरा शहर के व्यवसायियों का एक बड़ा हिस्सा भाजपा से अलग हो गया, जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा।

सामाजिक कार्यकर्ता मनोज उपाध्याय ने कहा कि जिस तरह से एनडीए ने शाहाबाद की चारों सीटों पर हार का सामना किया, उससे यह साबित होता है कि मतदाताओं का वोटिंग मूड निश्चित रूप से बदला है। इसकी समीक्षा करने की जरूरत है। हालांकि एनडीए गठबंधन के लोगों ने सवर्ण मतदाताओं को अपने साथ लाने की पूरी कोशिश की, लेकिन वे सफल नहीं हो सके। वहीं दलित, पिछड़ा, अति पिछड़ा, अल्पसंख्यक समुदाय का वोट महागठबंधन के उम्मीदवार को मिला, जिसके कारण भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 35 साल बाद एक बार फिर आरा लोकसभा सीट पर कब्जा करने में सफल रही। शाहाबाद की चारों लोकसभा सीटों पर जातीय समीकरण पूरी तरह हावी रहा।