विश्वास मत के ‘जाल’ में ‘खेलने’ की तैयारी! सीएम नीतीश के सामने हैं चुनौतियां! समझिए जुए के बड़े कारण

बिहार में नई सरकार के गठन के बाद इन दिनों सियासी हलचल तेज हो गई है. इसमें दबाव की राजनीति से लेकर रिसॉर्ट पॉलिटिक्स तक सब कुछ शामिल है. नीतीश ने भले ही 9वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली हो लेकिन सदन के पटल पर अपनी ताकत साबित करने के लिए उन्हें कई खेलों से गुजरना होगा। ये राह आसान होती नहीं दिख रही. ऐसे कई रोड़े हैं जो नीतीश सरकार की राह में नजर आ रहे हैं. नीतीश विपक्ष के जाल से कैसे अपनी राह निकाल पाते हैं, यह भी अहम बात होगी.

वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर नजर डालें तो ऐसा लगता है कि बिहार की राजनीति को समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. कब कौन किसके पाले में आ जाए कहा नहीं जा सकता. जहां कल तक नीतीश कुमार विपक्ष को एकजुट कर रहे थे और मोदी के विरोध में सभी दलों को एक मंच पर ला रहे थे, वहीं आज उन्होंने खुद एनडीए के साथ आकर बिहार में नई सरकार बना ली है. अब देखना यह है कि 12 जनवरी को विधानसभा के पटल पर विश्वास मत हासिल कर वह अपनी सरकार बचा पाते हैं या नहीं। समझें कि बिहार की राजनीति में इस वक्त जो पैंतरेबाजी दिख रही है उसकी वजह क्या है.

फ्लोर टेस्ट से पहले जेडीयू में टूट की आशंका

बिहार में आज विधानसभा में फ्लोर टेस्ट होना है. 243 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए 122 सीटों की जरूरत है. बीजेपी के पास 78 विधायक हैं जबकि जेडीयू के पास 45 विधायक हैं. एक निर्दलीय और चार हम पार्टी के विधायक, कुल आंकड़ा है 128 विधायक. राज्यपाल को दिए गए पत्र में एनडीए समर्थित सरकार ने इतने विधायकों को अपना समर्थन दिया है. ऐसे में जेडीयू को डर है कि अगर उसके 5 से 6 विधायक भी टूट गए तो उनकी सरकार खतरे में पड़ जाएगी. खबर यह भी सामने आ रही है कि जेडीयू के कई विधायक ट्रेसलेस पाए जा रहे हैं. शक्ति परीक्षण से पहले जेडीयू ने अपने सभी बड़े नेताओं को इन विधायकों की राजनीतिक घेराबंदी के लिए तैनात कर दिया है.

जेडीयू विधायक गोपाल मंडल ने माना है कि जेडीयू में कई विधायक अपना पाला बदल सकते हैं और कई विधायक मंत्री नहीं बनाए जाने से नाराज भी हैं. ऐसे में बीजेपी ने भी जेडीयू विधायकों को एकजुट रखने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी है क्योंकि बीजेपी को पता है कि जेडीयू के विधायक टूट सकते हैं. हाल ही में जेडीयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह के अध्यक्ष पद से इस्तीफे के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि ललन सिंह कोई बड़ा खेल खेल सकते हैं. नये राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार की नियुक्ति के बाद संगठन में बदलाव किये गये हैं. संगठन विस्तार में ललन सिंह को कोई पद नहीं दिया गया है. ऐसे में क्या नीतीश और ललन सिंह के बीच अंदर ही अंदर कुछ और पक रहा है?

विधानसभा अध्यक्ष पद से इस्तीफा नहीं दे रहे हैं

बिहार विधानसभा के निवर्तमान अध्यक्ष अवध बिहारी चौधरी राजद कोटे से हैं. उन्होंने अभी तक अपने पद से इस्तीफा नहीं दिया है. ऐसे में माना जा रहा है कि लालू यादव अपनी सियासी चाल चल सकते हैं. क्या यह बिहार में खेले जाने वाले उस खेल की स्क्रिप्ट का हिस्सा है जिसका जिक्र तेजस्वी ने किया है? क्या कुछ विधायकों को बर्खास्त करके या कुछ जेडीयू विधायकों को सदन से अनुपस्थित कर विश्वास मत गिराया जा सकता है? ऐसे में एनडीए की पूरी कोशिश होगी कि सबसे पहले अवध बिहारी को विधानसभा अध्यक्ष पद से हटाया जाए. उसके बाद सदन के पटल पर शक्ति प्रदर्शन कर नई सरकार को परखा जाना चाहिए.

हुकुम का इक्का जीतनराम मांझी का प्रतिस्थापन नोट

हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के सुर इन दिनों बदले हुए नजर आ रहे हैं. बिहार विधानसभा में उनकी पार्टी के 4 विधायक हैं. वे नीतीश सरकार में 2 मंत्री पद की मांग कर रहे हैं. उनके बेटे संतोष सुमन पहले ही मंत्री पद की शपथ ले चुके हैं. उन्हें पहले से एक अधिक विभाग भी दिया गया है. लेकिन अब वह एक और मंत्री पद की मांग कर रहे हैं.

दरअसल, मांझी जानते हैं कि इस वक्त दबाव की राजनीति करके उनकी मांगें पूरी की जा सकती हैं. उन्होंने यह बयान देकर भी बिहार का सियासी माहौल गर्म कर दिया कि उन्हें विपक्ष की ओर से मुख्यमंत्री बनने का ऑफर मिला है. ऐसे में अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो वे तेजस्वी को अपना समर्थन दे सकते हैं. बिहार में एनडीए के सहयोगी दल एलजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राम विलास, चिराग पासवान ने मांझी का समर्थन किया और कहा कि उनकी मांग जायज है. मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में मांझी सरकार बनाने में मददगार हैं. ऐसे में मांझी खुद को हुकुम के इक्के के रूप में देख रहे हैं. ऐसे में उन्हें पता है कि उनके 4 विधायक सरकार पर दबाव बना सकते हैं.

कांग्रेस की रिजॉर्ट पॉलिटिक्स

शनिवार को दिल्ली में हुई AICC की बैठक के बाद कांग्रेस ने अपने विधायकों को दिल्ली बुला लिया है और वहां से उन्हें हैदराबाद शिफ्ट कर दिया है. फिलहाल बिहार विधानसभा में कांग्रेस के 19 विधायक मौजूद हैं, जिनमें से 16 विधायक रविवार शाम को हैदराबाद रिजॉर्ट पहुंच गए हैं. अन्य विधायकों के भी जल्द ही वहां पहुंचने की उम्मीद है. दरअसल, बिहार कांग्रेस अध्यक्ष अखिलेश सिंह लालू प्रसाद से मुलाकात के बाद दिल्ली गए थे. लालू के कहने पर ही सभी विधायकों को रिसॉर्ट पॉलिटिक्स के तहत हैदराबाद में रखा गया था ताकि किसी भी तरह से कांग्रेस विधायकों को तोड़ा न जा सके. इसका मतलब साफ है कि राजद सदन में विश्वास मत को हराने की पूरी कोशिश कर रही है. इसके सूत्रधार लालू प्रसाद ने कमान अपने हाथ में ले ली है. वे तेजस्वी के लिए अपने सारे दांव दांव पर लगाना चाहते हैं. ताकि विधानसभा में विश्वास मत में कम वोटिंग हो और नीतीश सरकार को गिराया जा सके.

(नोट- ऊपर दिए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए लेखक ही जिम्मेदार है.)